दिव्य ज्योति जागृति संस्थान की ओर से आश्रम में सत्संग कार्यक्रम का आयोजन

 

जालंधरः दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से स्थित आश्रम में सत्संग कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसमें श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए संस्थान के प्रवक्ता श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी प्रीती भारती जी ने कहा कि रोज सुबह अखबार में देश भर की खबरें विस्तारपूर्वक पढऩे को मिलती है। भारत में फैले भ्रष्टाचार, गरीबी, शोषण, हिंसा, टूटी सड़कें, प्रदूषण, बलात्कार, रक्त रंजित भयावह दुर्घटनाओं की सुर्खियाँ पढ़कर मन गमगीन हो उठता है। सवाल करता है कैसा है यह भारत और क्यों मैं इस भारत का वासी हूँ? पर भारत के कुछ पक्ष ऐसे भी हैं जिससे हमें भारतीय होने पर शर्म नही बल्कि गर्व अनुभव होगा। फख्र से हमारा सीना चौड़ा हो जाएगा।

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वियतनाम और अमरीका के बीच बीस साल तक युद्ध चला। पर क्या आप जानते है कि उस युद्ध में विजय किसकी हुई? किसके सिर विजय का सेहरा बंधा? अमरीका नहीं वियतनाम। किन्तु यह कैसे संभव हो सकता है? कहाँ अमरीका और कहाँ वियतनाम। वियतनाम तो इतना छोटा सा देश है। वहीं अमरीका शक्तिशाली राष्ट्र, आधुनिक अस्त्र-शस्त्र से लैस विशाल सैना, द्वितीय विश्व युद्ध का विजेता। यही प्रश्र एक संवाददाता ने वियतनाम के राष्ट्रपति के समक्ष रखा था। जवाब में उन्होंने जो कहा वह हम सब भारतीयों को अचरज में डालने के लिए पर्याप्त है। उनका उत्तर था- युद्ध में 20 साल तक वियतनाम अमरीका के सामने डटा रहा और आखिर में विजय हासिल कर पाया, यह किसी चमत्कार से कम नहीं है। पर यह चमत्कार केवल और केवल भारत के आर्शीवाद से ही संभव हो पाया। दरअसल मैने भारत के एक महान योद्वा छत्रपति शिवाजी के जीवन चरित्र को उनकी कथा को बहुत ध्यान से पढ़ा था।

इस युद्ध में मैंने उन्हीं के आदर्शों का अनुसरण किया। उनकी रणनीति का पालन करके ही हम जीतने में समर्थ हुए। फि र वे जोशीले स्वर में बोले मैं पूरे विश्वास से यह कह सकता हूँ कि अगर हमारे देश में शिवाजी जैसा महान राजा पैदा हुआ होता तो आज हम इस समस्त भूमण्डल पर राज कर रहे होते। आगे तो उन्होंने यह तक कह दिया मेरी अंतिम इच्छा यही है कि मेरे मरने के बाद मेरी समाधि पर शिवाजी का एक शिष्य लिखा जाए और आज ऐसा देखने को भी मिलता है। इस घटना के कुछ वर्षों के उपरान्त ही वियतनाम की महिला विदेश मंत्री के भारत का दौरा किया। दौरे के दौरान उन्होंने छत्रपति शिवाजी की समाधि को देखने की इच्छा प्रकट की। वहाँ पहुँचकर उन्होंने श्रद्धाभाव से शिवाजी की समाधि को नमन किया। फि र झुककर उस स्थान से थोड़ी मिट्टी उठाई और उसे अपने मस्तक पर तिलक की तरह लगा लिया।

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उसके बाद थोड़ी मिट्टी एक कपड़े में बाँध कर अपने पर्स में भी रख ली। इससे पहले कि वहाँ उपस्थित भारतीय अधिकारी और संवाददाता उनके ऐसा करने का कारण पूछते उन्होंने स्वंय ही कहा मैं इस पवित्र मिट्टी को अपने देश वियतनाम की मिट्टी में मिला दूँगी। क्योंकि मैं उसे भी शिवाजी जैसे शूरवीर योद्धाओं की जन्मभूमि बनाना चाहती हूँ। भारत के एक महान योद्धा ने एक विदेशी प्रांत पर अपना किस कदर प्रभाव डाला इसका ज्वलंत प्रमाण है आज भी वियतनाम में छत्रपति शिवाजी की भव्य मूर्ति का होना। कहने का आशय यह है कि भारत देश न केवल संस्कृति में, सभ्यता में बल्कि पराक्रम में भी अद्वितीय रहा है। भारत भूमि ऐसे महान योद्धाओं की जन्मभूमि रही है जिनके अद्भुत शौर्य को विश्व नमन करता है।

jan sangathan

Media/News Company

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