फिल्म हसीना पारकर और भूमि को अगर जा रहे है देखने तो पहले पढ़ें ये मूवी रिव्यू

 

फिल्म हसीना के डायरेक्टर अपूर्वा लाखिया ने 2003 में फिल्में बनानी शुरू की थीं लेकिन अभी तक वे सिर्फ एक ही हिट फिल्म दे सके हैं और वह ‘शूटआउट एट लोखंडवाला’। फिल्म गैंगस्टर ड्रामा बनाते समय हमेशा कैरेक्टराइजेशन का ध्यान रखा जाता है लेकिन इस मामले में अपूर्वा पूरी तरह चूक गए हैं। फ़िल्म में कोई भी कनेक्शन पॉइंट नहीं मिलता और बायोपिक वाली इंटेंसिटी भी इसमें मिसिंग है।

कहानी-

हसीना पारकर(श्रद्धा कपूर) दाऊद इब्राहिम की छोटी बहन है और दिखाया गया है कि उसे अपने भाई की वजह से कई तरह की तकलीफों का सामना करना पड़ता है। फिल्म में बम धमाकों, हिंदू मुस्लिम दंगों और दाऊद के दुबई जाने के जरिये हसीना की जिंदगी को दिखाने की कोशिश है। हसीना श्रद्धा कपूर सीधी-सादी जिंदगी जीती है, अपने पति अंकुर के साथ। लेकिन दाऊद की वजह से उसकी जिंदगी ही बदल जाती है।

हसीना पारकर में सिद्धांत कपूर भी निराश करते हैं। अगर फिल्म भाई-बहन पर है तो क्या जरूरी है कि असल जिंदगी के भाई बहन को ही ऑनस्क्रीन भाई बहन बना दिया जाए। सिद्धांत बिल्कुल भी नहीं जमे हैं। हसीना आपा के रोल में श्रद्धा ने बहुत कोशिश की लेकिन वे वैसा नहीं कर पाई जैसा उन्हें करना चाहिए था। हसीना के रोल तक तो वे ठीक थीं लेकिन आपा का रोल उम्मीदों पर खरा नहीं उतर सका।

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फिल्म रिव्यू- भूमि

फिल्म भूमि की बात करें तो ये हसीना पारकर से कई गुणा बढ़ीया है, इसे देखकर आपके पैसों की बर्वादी नहीं होंगी। फ़िल्म के एक सीन में जब पुलिस इंस्पेक्टर पूछता है कि चाचा ही बोले जा रहा है, लड़की का बाप गूंगा है क्या? तो चाचा जवाब देता है कि हर लड़की का बाप गूंगा होता है। हालांकि इस फ़िल्म में लड़की का बाप गूंगा कतई नहीं है। वहीं उसकी बेटी भी अपने साथ हुए अन्याय पर चुप रहने की बजाय बारात लौटा कर विलन को करारा जवाब देती है, जो सोचता है कि वह अपनी शादी वाले दिन मुंह किस मुंह से खोलेगी।

फ़िल्म की कहानी अरुण सचदेव (संजय दत्त) की है, जो अपनी बिना मां की बेटी भूमि ( अदिति राव हैदरी) के साथ आगरा में रहता है। अरुण अपनी बेटी को इतना चाहता है कि उसकी शादी पर हर बाराती को अपनी जूतों की दुकान से जूते पहनाता है, लेकिन जब अचानक बारात लौट जाती है, तो उसे पता लगता है कि धौली (शरद केलकर) ने अपने गुंडों के साथ मिलकर उसकी बेटी का रेप किया है। एक आम भारतीय की तरह अरुण और भूमि पुलिस और अदालत के चक्कर भी लगाते हैं, लेकिन वहां भी उन्हें इंसाफ नहीं मिलता। और तो और भूमि और अरुण सब कुछ भुला कर नई जिंदगी जीना चाहते हैं, तो दुनिया उन्हें जीने नहीं देती। आखिर बाप-बेटी अपने साथ हुए अन्याय का बदला कैसे लेते हैं? इसका पता आपको थिएटर में जाकर ही लगेगा।

रिवेंज ड्रामा और एक्शन की उम्मीद लगाए दर्शकों को हाफ टाइम तक कोई भी ऐसा मूमेंट नहीं मिला जिसमें वे सीटी मार पाते। हालांकि दर्शकों ने शेखर सुमन के हल्के फुल्के संवादों पर हंसने की कोशिश की। गैंग रेप जैसे विषय पर फिल्म थी। दर्शक जबरदस्त रिवेंज देखना चाहते थे। लग रहा था कि इंटरवेल के बाद संजय दत्त फॉर्म में लौटेंगे। लेकिन डायरेक्टर शायद इस बात को भांप नहीं पाए, और बहुत आखिर में जाकर उन्होंने संजय का सही इस्तेमाल किया। वह भी आधा-अधूरा बेटी के रेप का बदला लेने का जो तरीका फिल्म में दिखाया गया वह भी बांधने वाला नहीं था। धीमा और उलझा के रख देने वाला था। रिवेंज ड्रामा में भी फ्लो नहीं आ सका।

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jan sangathan

Media/News Company

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